बदलता समा दिवाली का।

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लखनऊ : त्रेतायुग से कलयुग तक वक्त ही नही बदला बल्कि जमाने का अंदाज ही बदल गया है जिंदगी जीने का सलीका हो या त्यौहार की रौनक हर चीज में बदलाव है त्यौहारों पर कोरोना की मार और महंगाई हावी है। रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर बचन न जाई। त्रेतायुग मे पिता की आज्ञा पर राजतिलक त्यागकर भगवान राम 14 वर्ष के लिए बनबास गए। तो मर्यादा पुरूषोत्तम बनकर वापस लौटे। बनबास से लौटने और राम के राजा बनने पर अयोध्या को दुल्हन की तरह सजाया गया। कोशिश थी कि अमावस की रात का अंधेरा खुशियों पर असर न डाले लिहाजा अयोध्या में बेसुमार दीए जलाये गए। ताकि रात में भी उजाला भर जाए। उस दिन से दीवाली मनाने का चलन सुरु हुआ जो त्रेतायुग से कलयुग तक जारी है। उस दौर में आज की तरह बिजली के इन्तजामत नही थे पर उजाले का जिक्र पुराणों,और महाकाव्यों में है। तब आबादी कम थी जंगल ज्यादा थे लिहाजा सूखी लकड़ियों को जलाकर उजाला किया गया होगा। गांव जिंदा थे तिलहन की सुद्ध फसले भी होती थी तेल की कमी न थी और राम की लौटने की खुशी में किसानों ने घी के दियों की झड़ी लगा दी। अब वक्त बदल गया है बढ़ती आबादी के लिए संसाधन कम पड़ रहे है विकास की चारो तरफ पुकार हो रही है बिजली पानी रोजी रोटी के लिए गांव खाली हो रहे है। बढ़ती आबादी खेती खा गई है। खेतो में कारखाने आबाद हो गए है तो सड़को से सटे गांव में कस्बे पसर गए है। लिहाजा अब दीये नही जलते बिजली की लड़ियों से गांव शहर नहाये हुए है।

कभी आपने गौर किया है कि त्यौहार कोई भी हो होली हो या दीवाली बाजार उसे कैश कराने के लिए तैयार रहता है। सजीले छबीले विज्ञापन आपकी हसरतों को परवान चढ़ाते है। स्कीमों के कार्पेट बिछाये कंपनी ईएमआई की जी हुजूरी के साथ आपकी खिदमत करने के लिए तैयार है। वक़्त बदल गया है कभी पूरे मुहल्ले की लिए त्याग था अब आलम ये है कि घर में रहने वाले चार लोगों को एक टीवी से तसल्ली नही है। दीवाली के मौके पर बाजार आपकी राह देख रहे है फिर चाहे बो इलेक्ट्रॉनिक का सामान हो या गिफ्ट का।

जैसे जैसे वक्त बदल रहा है तकनीक अलाउददीन का चिराग होता जा रहा है। बाजार में तकनीक त्यौहारों के कन्धे पर सवार है। बाजार उत्सवों को कैश करा रहा है। जिसके लिए पहले से ही तैयारियां कर ली जाती है। पहले दीवाली में बाजार सजता था लेकिन आज की तरह उसका अंदाज कैची चलाने का नही होता था। या ग्राहक को ललचाकर कर्जदार बनना नही होता था। आज फाइनेंस कंपनिया बैठी है। आपको कार, बाइक टीवी, फ्रिज, फर्नीचर जो चाहिए 0 फीसदी के लुभावने नारे पर उपलब्ध हो जाएगा। निर्माता से लेकर फाइनेंस कंपनियां तक चांदी काट रही है।दीवाली के लिए बजार हसीन और जवान दिखाई दे रहे है। बस मामूली सुरुआती दस्तावेज शुल्क का वादा किया जाएगा और अपने घर को सजाने के लिए जो चाहे बो चीज खरीद कर अपनी हसरत पूरी कीजिये। पहले ऐसा नही था पहले दीवाली में बाजार जरूरते तो बिखेरता था लेकिन उसे खरीदने का लालच नही देता था लेकिन। तब आबादी काम थी एक टीवी में पूरा मुहल्ला देख लेता था अब घर मे ही दो तीन टीवी है। माँ सीरियल देखती है तो पिता समाचार सुनते है और बेटा स्पोर्ट का मजा लेता है। जिसके पास कम है बो दीवाली जैसे त्यौहारों और सीजन में अपनी ख्वाइश पूरी कर लेता है।

बाजार में इलेक्ट्रॉनिक और इलैक्ट्रिक उपकरणों की बाढ़ आई हुई है दीवाली की रौनक सामानों की वजह से ज्यादा बडी हुई ही। कोई त्यौहार ऐसा नही जिसके लिए बाजार तैयार न बैठे हो। गिफ्ट शॉप मुस्कुरा कर आपका स्वागत कर रहे है फूलों के गुलदस्ते से लेकर टेडी वियर भी दीवाली में अपनी जगह बना चुके है। पहले कोई ये सब नही जानता था फूल पूजा घर की सोभा बढ़ाते थे या मकान के दरवाजे की। अब शुभकामनाएं और करीबी होने का इजहार करने के लिए फूल देने का चलन है। दुनिया के साथ साथ देश प्रदेश बदल रहा है। उत्तर प्रदेश में भी अब हर शहर में फूल और गिफ्ट आइटम की दुकानें दीवाली के लिए जलवा परोस रही है।

दीवाली में आप बदलाव साफ महसूस कर सकते है उपहार से लेकर मिठाई तक हर जगह बदलाव है। पहले दीवाली के लिए मुहल्ले का मिठाई वाला भी एक सप्ताह पहले तैयारी करता था। अब आलम ये है कि शहर में मिठाई का बस शोरूम है कारख़ानों में माल तैयार हो रहा है। थोक के भाव मे मिठाईया तैयार हो रही है। अब मावे घोटने का चलन खत्म सा हो गया है। अब न जाने कहां से रेडीमेट मिठाईया तैयार हो रही है। आबादी बढ़ रही है खेती का रकवा घट रहा है। पशुपालन का चलन खत्म हो रहा है। लगता है गांव लोग मर से गये है। लेकिन दिवाली के बाद ज्यादातर शहर गांव की दुकानों पर बची मिठाईया फ्रिज में रख कर महीनों बेची जाती है।

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